संपूर्ण समर्पण ही ध्रुपद हैं |
"ॐ अंतरंम् त्वम् तरन तारन त्वम् अनंत हरि नारायण ॐ"

ध्रुपद ॐ से प्रारंभ है और ॐ से ही समाप्त
अनादि काल से ध्रुव तारा ने निर्धारित स्थान से संपूर्ण समर्पण भाव से दिशाओं का पृथ्वी वासियों को मार्गदर्शन कराता आ रहा है, उसी प्रकार संगीत में ध्रुपद मानव को अपने कर्ता-धर्ता के प्रति संपूर्ण समर्पण भाव से स्मरण कराने की पद्धति का प्रकार है | ध्रुपद संस्कृत के शब्द ध्रुव पद का हिंदी रूप है ध्रुव यानि जो नित्य है स्थिर है और पद यानी शब्दों का समूह इस तरह ध्रुपद का मतलब हुआ शब्दों की एक निश्चित पद्धति से की हुई रचना और शब्दों के इसी विन्यास का नाम पड़ा ध्रुपद |
ध्रुपद के पद में बिठाए गए शब्दों के काव्यात्मक, साहित्यिक, और आध्यात्मिक सौंदर्य को संगीत की स्वरावालियों में बदलना ही ध्रुपद गायन है | ध्रुपद संगीत कि वह संरचना है जहां उच्छृंखलता से हटकर एक नियम बद्धता है, व्यवस्था है, आज की भाषा में एक आचार संहिता है तात्पर्य यह नहीं है कि वहां कल्पनाशीलता नहीं है, विकास नहीं है अथवा जड़ता है, अपितु साधना की परीक्षा है उसमें आनंद की खोज और यही आनंद हमें रसों से प्राप्त होता है जिसका उदाहरण हमें वैदिक सुक्तों में मिलता है
आपो हिष्ठा पयोभुवः | ता न उर्जे दधातन | महे रणाय चक्षसे |
यो वः शिवतमो रसः | तस्य भाजयते हि नः |
ध्रुपद गायन ईश्वर की आराधना का माध्यम है प्राचीन काल में ध्रुपद के मंत्र अर्थात पद - देवी देवताओं को समर्पित होते थे और उन्हीं के प्रतिमाओं के सामने बैठकर गाए जाते थे | ध्रुपद गायन में गंभीरता होती है एवं मीड़, गमक, आंदोल इत्यादि का प्रयोग होता है| हिंदू मंदिरों में आरती इसी शैलियों में होती है, यही कारण है कि ध्रुपद गायन में पूजा के विधि विधान स्वत ही आ गए हैं | ध्रुपद के बीज "सामवेद" में है पर इसका लिखित इतिहास प्रबंधकों के काल से मिलता है | प्रबंध ध्रुपद के पहले कि एक गायन शैली थी इसकी भाषा संस्कृत हुआ करती थी | प्रबंधों का परिष्कृत रूप ही ध्रुपद है | मध्यकाल में सर्वाधिक प्रचलित ध्रुपद गायन शैली का इतिहास शास्त्रीय और उपशास्त्रीय संगीत की गायन वादन सभी शैलियों की तुलना में ७०० से ८०० वर्षों का माना जा सकता है | और निरंतर अनेक उतार-चढ़ावों के मध्य आज भी इसे व्याकरण की शुद्धता एवं रस की अनुभूति के लिए सम्मानीय स्थान प्राप्त है | १४२५ से १४५९ में ग्वालियर से ध्रुपद की जड़ें मजबूत करने की शुरुआत वहां के राजा योगेंद्र सिंह ने, 15वीं शताब्दी में ग्वालियर में महाराजा मानसिंह तोमर ने इसमें कई प्रयोगों को जोड़ा जैसे ध्रुपद को संस्कृत, दक्षिण भारतीय कीर्तन पद्धति, उत्तर भारतीय ब्रजभाषा में विस्तारित करते हुए संस्थापित और विकसित किया शायद इसीलिए इन्हें दरबारी ध्रुपद का जनक कहा जाता है | ध्रुपद ने ग्वालियर को प्रसिद्ध बनाया | इब्राहिम लोदी के ग्वालियर में आक्रमण एवं लूट का दूसरा पहलू ध्रुपद के लिए वरदान सिद्ध हुआ यह देश के विभिन्न दिशाओं में पहुंचा यही कारण है कि हिंदी के अलावा पंजाबी, राजस्थानी, बांग्ला, उर्दू आदि भाषाओं में भी ध्रुपद की रचना हुई| आगे चलकर प्रसिद्ध गायक मियां तानसेन द्वारा मुगल दरबार में तथा समकालीन प्रसिद्ध गायक नायक बैजू , गोपाल नायक, प्रमोद तरंग एवं तानसेन पुत्र विलास वरत खां तथा कई अन्य प्रसिद्ध गायकों द्वारा ध्रुपद को सभी स्थानों पर सम्मानित किया | उसके पश्चात 16वी शताब्दी तक संगीत के शिखर पर रहने के बाद ध्रुपद सुप्त हो गया इसमें मनमाने परिवर्तन किए गए और रंजकता पैदा करने की कोशिश की जाने लगी लेकिन पुनः जागृत होते हुए इब्राहिम आदिल तथा 18वीं शताब्दी के बाबा गोपाल दास, बाबा बैरम खां से होते हुए उस्ताद ज़ियाफरीदुद्दीन खां डागर साहाब तथा उस्ताद रहीम फहीमुद्दीन खां डागर साहाब की समकालीन गायकों ने देश एवं विदेशों में इसकी शिक्षा एवं मंच प्रस्तुति करते हुए इसका विस्तार किया जिसमें परम पूजनीय उस्ताद ज़ियाफरीदुद्दीन डागर साहेब का नाम ध्रुपद के प्रचार-प्रसार हेतु तथा परम पूजनीय उस्ताद रहीम फहीमुद्दीन खां डागर साहाब द्वारा नाद् ब्रह्म की गायकी तथा नाद् योग के ज्ञान को संपूर्ण विश्व में प्रचार तथा उसके आनंद को सम्पूर्ण जन मानस में प्रसार हेतु सदा याद किया जाएगा |
ध्रुपद नाद ब्रह्म की गायकी है इसीलिए यह एक शोध का विषय है यह अपने में अध्यात्म, विज्ञान, काव्य, साहित्य आदि कलाओं को सम्मिलित करते हुए विद्यात्मक है अतः इसे प्रयोगों के द्वारा जाना एवं समझा जा सकता है| यह अल्पकालीन विद्या या शिक्षा नहीं अपितु यह जीवन पर्यंत के शोध का विषय है अर्थात चेतना का ज्ञान तथा आत्म साक्षात्कार का मार्गदर्शन कराता आ रहा है | ध्रुपद की चार वाणिया है १ "डॉगर वाणी", २ "खंडार वाणी" ३ "नौवहार वाणी" ४ "गौवहार वर्णी"
5 गीतियाँ है १ साधरणी २ भिन्ना 3 शुद्ध ४ बेग्गासराय ५ गौरी
इसकी साधना गुरु शिष्य परंपरा के अंतर्गत ही संभव है गुरु शिष्य परंपरा भारत की एक प्राचीन सुव्यवस्थित परंपरा है वैसे तो वैदिक काल से ही गुरुकुल परंपरा की स्थापना हो गई थी लेकिन ध्रुपद में स्वामी हरिदास डागुर जी ने गुरु शिष्य परंपरा में उल्लेखनीय योगदान करते हुए इस प्रवृत्ति को जागृत किया | आज ध्रुवपद का पर्याय माने जाने वाले डागर घराने के अतिरिक्त दरभंगा घराना, बेतिया, विष्णुपुर घराना तलवाड़ी (पाकिस्तान) जिसे ननकाना साहिब भी कहते हैं, घरानों में भी ध्रुवपद की विशिष्ट साधना दिखाई देती है, वल्लभ संप्रदाय के अष्टछाप सहित अन्य भक्त कवियों में कृष्ण साहित्य में इर्द-गिर्द ही यह सभी शैलियां घूमती हुई दिखाई देती है ध्रुपद के साथ बजने वाले वाद्य हैं मृदंग (पखावज) और तुम्बुर ( तानपुरा) |
मृदंग जहां गायन को ताल और लय की सीमाओं में बांधता है वही तुम्बुरा, आवाज के दर्पण का काम करता है | तुम्बुरा कि झड़ती आवाज से गायक राग को चुनता है एवं गायन प्रारंभ करता है ध्रुपद के राग, लय, ताल और धातुओं की एक अलग चारित्रिक विशेषता होती है | जो इस गायन को दूसरी शैलियों से भिन्न करती है जैसे ध्रुपद के राग अपने स्पष्ट और शुद्ध रूप में ही होती है जबकि अन्य शैलियों में रागों की शुद्धता को लेकर ऐसी कोई लक्ष्मण रेखा नहीं होती है और अक्सर उसमें रंजकता पैदा करने के लिए एक राग को दूसरे में मिला दिया जाता है परंतु ध्रुपद में रागों की शुद्धता की कीमत पर ऐसा कुछ नहीं किया जाता है | ध्रुपद गायन, दो चरणों में संपन्न होता है पहला चरण होता है आलाप का जिसे प्रकरण अध्याय भी कहते हैं वह काफी लंबा और विस्तार लिए होता है आलाप से ही पता चलता है कि गायक कौन से राग का गायन प्रस्तुत कर रहा है आलाप मैं कोई पद नहीं होता ज्यादातर जो शब्द उच्चारित किए जाते हैं वह है ॐ, नोम, र, री, ना, त | इन शब्दोँ के सामूहिक रूप को नोम् तोम् कहते और इन्हीं चंद शब्दों के आधार पर आवाज को देर तक विस्तार देना जहां इस शैली को कष्टसाध्य बनाता है वहीं दूसरी ओर आलाप को ज्यादा भावपूर्ण और ह्रदय स्पर्शी बनाता है | आलाप का इस कदर विस्तार गायन किसी शैली में नहीं मिलता | आलाप की जो शैली है उसका आधार "ॐ अंतरम त्वम् तरन तारन त्वम् अनंत हरिनारायण ॐ" से बढ़ता जाता है | आलाप के बाद का चरण होता है बंदिश का रचना के गायन का वह आलाप के तुरंत बाद बिना किसी अंतराल के शुरू हो जाता है साधारणता ध्रुपद में प्रयोग होने वाले ताल हैं चौताल, सुल ताल, तीव्र, धमार आदि | गायक अपने शुद्ध योग मुद्रा में आकर नाद योग ध्वनि को स्वर में बदलता है नाद साकार होता है ताल और लय में बंध कर और रागों में ढलकर शब्द संगीत बनता है और वातावरण में इसकी स्वर लहरियां गूंज उठती है विद्वानों ने इसीलिए कहा है कि स्वर को नाभि से उठाओ जिसका प्रमाण ऋग्वेद के वाक्य सूक्त में आता है -
"मम योनिरप्सवन्तः समुद्रे |"
सिर्फ गाने की पद्धति अपनाने से हि चीज ध्रुपद नहीं बन जाता जब तक उसमें आत्मा शामिल ना हो क्योंकि यह नाद ब्रह्म की गायकी है इसलिए ईश्वर ने हमें नाद ब्रह्म के रूप में अमूल्य उपहार दिया है हर बजाने वाली या सुनाई देने वाली चीज नाद नहीं हो सकती इसका अपना एक सिद्धांत एवं शास्त्र है नियमों मैं बंध कर सलीके से किया जाने वाला उच्चारण ही नाद है जिसमें नियमित एवं सतत कंपन होता है संगीत में नाद कहते हैं इसी से दुनिया के आदी संगीतों की उत्पत्ति हुआ है इसीलिए इसे नाद ब्रह्म की गायकी कहा गया है भारतीय संगीत अध्यात्म से जुड़ा है और ध्रुपद उसका मार्ग रोशन करता है इसका महत्व हमारे मस्तिष्क में उर्वरक शक्ति प्रदान करती है हमें उच्छृंखलता एवं उद्दंडता से हटाकर गंभीरता और अनुशासित करती है एवं आनंदित एवं उल्लासित करती है जिस तरह जन्म देने वाली एवं संस्कारों की रीड खड़ी करने वाली बुजुर्ग पीढ़ी का महत्व सदैव माना जाएगा उसी तरह यद्यपि आज ध्रुवपद के वट वृक्ष की छत्रछाया में फलने फूलने वाली बेलें और पेड़ पौधों इन शैलियों शास्त्रीय तथा उपशास्त्रीय का महत्व तो निश्चित है किंतु आज इन सभी शैलियों को अपने ज्ञान की फसल से सींचने वाली ध्रुवपद शैली की कठोर साधना की गहनता और उसके महत्व को समझना है | युद्ध काल के दौरान शत्रुओं पर विजय पाने की तथा शांति काल में मानव के कल्याण और उन्हें सुख सुविधाएं उपलब्ध कराने के दृष्टिकोण से विज्ञान महत्वपूर्ण है लेकिन यदि हमें जीवन में मनुष्य के दृष्टिकोण को विस्तृत और बुद्धिमत्तापूर्ण बनाना हो तो हमें अपनी शास्त्रीय विधाओं पर भी जोर देना चाहिए विज्ञान का शास्त्रीय विद्या से संबंध मोटे तौर पर साधन और साध्य का संबंध कहा जा सकता है |
मैं पल्लब दास ध्रुपद गायक पूनः आपके सम्मुख यह कहना चाहता हूँ की - "ध्रुपद अर्थात नाद् ब्रम्ह कि गायकी योग विज्ञान का एक विशिष्ट एवं उत्कृष्ठ ज्ञान एवं शोध का विषय हैं "| जिसे "गुरु शिष्य परंपरा के अंतर्गत निरंतर अभ्यास से समझा तथा इसका अलौकिक आनंद को प्राप्त किया जा सकता हैं"|
मेरा गृह अर्थात घर (HOME) हि एक गुरुकुल हैं जहाँ मैं आपने गुरुओं तथा माता पिता के आशीर्वाद से "गुरु शिष्य परंपरा" के आधार शिला को रखते हुए शुद्ध भारतीय संगीत अर्थात ध्रुपद (नाद् ब्रम्ह कि गायकी) को अपने शिष्यों एवं जन मानस में प्रचार एवं प्रसार करने का कार्य कर रहा हूँ | इस शुद्ध भारतीय संगीत अर्थात ध्रुपद से मेरा साक्षात्कार मेरे पिता एवं गुरु "परम पूजनीय श्री गोरख नाथ दास जी" ने करवाया तथा निरंतर इस विधा में आगे बढ़ते हुए गुरु शिष्य परंपरा के अंतर्गत ध्रुपद के इतिहास का ज्ञान, इसके विभिन्न विधाओं का ज्ञान एवं गायकी मैंने "परम पूजनीय उस्ताद ज़ियाफरीदुद्दीन खां डागर साहाब" से प्राप्त किया, तत्पश्तात गुरु शिष्य परंपरा के अंतर्गत ध्रुपद के इतिहास का अति विशिष्ठ ज्ञान, नाद् योग एवं नाद् ब्रम्ह कि गायकी का ज्ञान मैंने "परम पूजनीय उस्ताद रहीम फहीमुद्दीन खां डागर साहाब" से प्राप्त किया एवं सतत् अभ्यास एवं शोध करता जा रहा हूँ तथा मैं आपने गायकी में मेरे दोनों उस्तादों द्वारा दिए हुए ज्ञान को एक साथ प्रस्तुत करने का भी प्रयास करता हूँ एवं इस विषय में निरंतर शोध भी कर रहा हूँ |
ॐ नाद् ब्रम्ह